रविवार, 28 अगस्त 2011

जन लोकपाल के बहाने
सारा देश एक नयी सुबह का साक्षी बना पुर सुकून अंदाज़ मैं सांस ले रहा है ----सब लोगों के साथ मेरा विश्वास भी लौट आया है की ---अरे ये क्या !
हम तो एक जिंदा समाज मैं सांस ले रहे हैं वर्ना कई सालों से लग रहा था की सब खत्म हो गया ---कहीं कोई चिंगारी नहीं बची ---भला होअन्ना का जिस ने डूबती कश्ती को किनारे की आस बंधा दी -----मैं भी एक निजी स्वार्थ वश ये बात कह रही हूँ ----कल तक मुझे लगता था की सब अंग्रेजी ही बोलते हैं ---और अंग्रेजी ही समझते हैं ---लेकिन एक सुखद बयार में मेरा भी भरम तोड़ दिया -----
अचानक देखा की सब जन लोकपाल कह रहे हैं हर जाती हर वर्ग का हर उम्र हर तबके का आदमी सिर्फ और सिर्फ जनलोकपाल ही कह रहा है -----यही नहीं बड़े बड़े शब्द हिंदी के ही बोले जा रहे हैं -----शुद्ध आचार ---शुद्ध विचार ----त्याग --अपमान सहने की शक्ति -----अनशन -----संघर्ष -----जैसेकठिन और नीरस समझे जाने वाले हिंदी के शब्द जनता और नेता दोनों की जवान प़र आये ----तो सुकून इस वात हुआ की चाहे मानें या न मानें हिंदी लोगों की जबान प़र आसानी से चढ़ गयी है ----महात्मा गाँधी ने गुजरती भाषी होते हुए भी हिंदी को अपने आन्दोलन की भाषा बनाया ----इसी तरह आदरणीय अन्ना जी ने भी मराठी भाषी होते हुए भी हिंदी को अपने आन्दोलन का अलंकर बनाया ---अब तो माँ ही लेना होगा की हिंदी जन जन का कंठहार है ---जय हिंदी ----जय भारत

रविवार, 15 अगस्त 2010

चलो थोड़ी दूर चलें

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

अं
क्या ये हमारा ही देश है ?
राहुल दुल्हनिया ले जायेगा ----- क्यों ले जाये राहुल एक नयी दुल्हनिया चुन कर जब हमारी बेटियां बिंदास बाज़ार मैं खड़ीं हैं बेझिझक
हर शर्त मानने को आतुर --और हों भी क्यों उन्हें ये सुन्दर भविष्य चुनने के लिए उनके माँ बाप ने दही पड़े खिला कर भेजा है -----कहा है जा बेटी हमारे यहाँ टी सावित्री ने भी अपना वर खुद ही चुना था ---सीता का भी स्वयंबर हुआ था ---और फिर ये तो नया ज़माना है हर आदमी अपना भविष्यबना रहा है
तो तुम क्या किसी से काम हो ---अरे हमारे ज़लवे लोग देखते ही रह जायेंगे की देखो उनकी बेटी ने रातोंरात कितनी शोहरत कमाई है कितने बड़े खंडन कज बहु बन गयी जिसमें नए ज़माने की साडी खूबियाँ हैं जो अपने ही भाई को भी नए ज़माने के उसूलों पार बलिदान कर सकते हैं कल तुम्हारा नाम भी उस महान खंडन से जुड़ जायेगा तो तुम भी रातोंरात मशहूर हो जाओगी ---------कोरे आदर्शों को क्या ओढें क्या बिछाएं हम लोग --- बेटी बिंदास जाओ --और अपनी किस्मत की लकीरों को चमकाओ ---दोनों हाथ लड्डू रहेंगे इस खेल मैं हर गयीं तो लोक्प्रिता मैएगी ही मिलेगी और जित गयीं तो वारे न्यारे हैं ही --------
क्या सोच रही हो लाओ आज से ही मैं तुम्हारी साडी तयारी करवा देती हूँ ---------चलो अभी बाज़ार चलो ------यूँ गुमनाम रहने से किसी को कुछ नहीं मिलता है भाई अरे कुछ पाने के लिए तो कुछ कारना ही पड़ता है ------अब वो ज़माना लड़ गया जाब माँ बाप अपनी बेटियों की शील की सदाचार की दुहाई दे दे कर उन्हें ये कह कर मरने के लिए छोड़ देते थे की जा बेटी हमारी लाज तेरे हाथ है ---जिस घर मैं तेरी डोली जाये वहां से अर्थी ही उठे ---और बेटियां भी हँसते हँसते ससुराल की बलि बेदी पार शहीद हो कर माँ बाप का सर गर्व से ऊँचा करती थी ----------अब तो ये सब पशन कल की बातें लगती हैं अरे हम इक्कीसवी सदी के दस साल आगे चुके हैं ---चिता मत कर जा और बेधड़क जा ---चिड़िया की आँख की तरह अपने लक्ष्य पार अर्जुन का सा निशाना साध ----अरे हाँ देख १मैने और तेरे पापा ने भी फिनाल के लिए कपडे तयार करवा लिए हैं देखना ----व्याज समेत हमारी लगत निकल आयर ज़रा ध्यान रखना ---मेरे सिखाये गुर याद रहींगे ----अरे राहुल तो भावुक सा बेवफा सा लड़का है उसे पटना तो तेरे बाएं हाथ का खेल है ---और फिर मेरी दुआएं भी तो हैं तेरे साथ ---अरे अब जाएगी तो अरबपति बन कर ही लोतेगी ---फिर सब कहेंगे ---राहुल दुल्हनिया ले आया ---नए भारत के माहौल मैं एक अजीब सी महक अं ----ततो अं -------मैं का का से पानी पानी हुई जा रही होंगी की हाय हम शर्म करते तो ये चांस तो गँवा पाते ----कोई बात नहीं ----राहुल कि सीज़न कि ही लिस्ट ka

शनिवार, 13 दिसंबर 2008

एक सपना मीठा सा

माना की वो दिन अब नहीं हैं जब युवा पीदी केवल रंग और रस मैं सराबोर रहती थी ---आज का युवा तो जी तोड़ मेहनत करता है उसके काम के घंटे बेहिसाब हैं उसकी लगन लाज़बाव है ;उसकी एक प्यारी सी दुनिया है जो उसने अपनी मेहनत से ख़ुद रची है ---और उसकी मेहनत से खुश हो कर प्रभु भी उस पर प्रतिपल कृपा बरसाते रहते हैं जिक्र उसी दुनिया के एक छोटे जादूगर का है जिसने एक सपना देखा मीठा सा और अपनी पूरी शक्ति और पूरी भक्ति से उसे पूरा करने मैं लग गया अपनी मां का ये नन्हा सा कन्हैया सात समंदर पार गया प्रभु ने उसे कृपा के पंख दिए ---समझ दी और हौसला भी दिया और एक दिन सपने की कहानी मैं रानी भी आगई --एक सुकुमार सी प्यारी सी रानी जो कृपा का कहो या संयोग का एक अनोखे प्रसाद की तरह उस जादूगर की छड़ी बन कर आई ---और सब पर अपनी मोहिनी डाल दी -----ये एक मशहूर कहानी का जाना पहचाना सन्सकरन है जिसमे मीठे से सपनो की महक है ---अथक परिश्रम की चमक है --और सच्चाई की गमक है सपने को अपना बनाने की ललक है इसीलिए तो अनमोल सी अनोखी सी कशिश को लेकर जो ये कारवां सॉफ्टवेर इंजीनेर्स का गया है इनके सपनों की खूबसूरती से एक नया इतिहास रचा जा रहा है -----ये प्यारे से नौजवान जो घर से दूर घर बसाने का सपना देखते हैं वही इनकी मेहनत की मीठी सी दास्ताँ है । सपनों की महक से लवरेज इनके मन बहुत ही सुंदर हैं क्योंकि उनमें बदलते हुए समय की खनक सुनाई देती है देखते ही देखते दुनिया को बदलने की सोच भी और तजवीज़ भी ---यही वो पीढी है जिस मैं सच्चाई है निष्ठां है और दूरदर्शिता है ---मन से दुआ देते हैं की इनका आसमान सतरंगे इन्द्रधनुशो से भरा रहे इनकी गोद मैं खुशियों के हजारों फूल महकते रहें इनका ज़हान प्रभु की कृपा से सदा आबाद रहे कुछ शब्द इनके जीवन मैं कभी आंएँ जैसे उदासी .....निराशा और नोस्टेल्जिया भी न हो ---ये प्यारी सी नई पीढी अपने अपने मीठे सपनों को पूरा करने मैं जी जान लगा दें -----तस्वीरmain सुंदर रंग भरें जीवन मैं फूलों की राहें --- मिलें -----देश की एक मां का आशीष सबकोपहुंचे १४ दिसम्बर २००८ के विशेष अवसर की सबको बधाई एक सच होने वाले मीठे सपने की सालगिरह कीहज़ार हज़ार बधाई - की सबको प्रभु तुम्हे और बहुत सारे सपने देखने का हौसला दें और पुरा करने की शक्ति देंमगर शर्त ये है की हर सपना पहले सपने को और अधिक खुश करने के लिए हो ------जय श्री कृष्ण !

शनिवार, 29 नवंबर 2008

कब तक

अंधाधुंध गोलियों की बौछार से आज तो मै और मेरा परिवार बच गया लेकिन कल का क्या भरोसा ---आख़िर बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी कब तक हम एक आशंका भरी ज़िन्दगी मैं पल पल मर मर कर जीते रहेंगे --सभी को महानगरों मैं रहना है ---काम पर भी जाना है ---और खास दर्द को धोते हुए जाना है की आज लोटे या नही ?---देश के जावन शहीद हो रहे थे आतंक से लड़ कर और दूसरी तरफ़ देश के कलम्गर पत्रकार और फोटो ग्राफर अपनी अपनी कामयाबी के झंडे गद रहे थे बड़ा ही दयनीय लग रहा था एक पत्रकार ने तो उसे असली रियलिटी शो का नाम भी दे दिया और अपनी पेशकश पर बड़ा खुश भी हुआ होगा ---लेकिन मेरा मन तो वित्रश्ना से भर गया ---साहित्य मैं एक रस है करूँ रस जिसने केथार्सिस का सिधांत लागु होता है यानि जब हम करून रस को भी आस्वाद ले कर देखते हैं ठीक इसी तरह लग रहा था जब हम असहनीय दृश्यों को भी चर्चा कर कर के देख देख रहे थे --और ख़ुद को महिमामंडित कर बड़े ही संवेदनशील समझ रहे थे की भाई हमने तो एक मिनिटे के लिए भी टी.वि । बंद नही किया ---लेकिन सोचो कबीर ने कहा है ------जगत चबेना कल का कुछ मुख मैं कुछ गोद ---इस पंक्ति का अर्थ अब हो गया है ----भारत चबेना आंतंक का कुछ मुख मैं कुछ गोद ---और भी कहा आज नही तो कल तुम सबकी बार आही जायेगी आख़िर बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी ------ फूली फूली चुन लई कलः हमारी बार ---इस पंक्ति की भी ध्वनी बदलआखि r वारूद के ढेर पर बैठ कर कोई कब तक बच पायेगा -----मेरा एतराज़ सिर्फ़ ये है की हम अपने शहीदों की मौत को शहादत को भी सुचना मात्र मैं न बदल देन ये एक जघन्य अपराध होगा -----आख़िर ये न्यूज़ चैनल कहाँ तक जायेंगे कल को तो ये युध का भी लाइव कवरेज़ करेंगे ---आखि इनकी उर्जा खुफिया तंत्र मैं क्यों नही लगती क्यों ये दोसरों की तवाही का जश्न का मन कर अपने झंडे गड़ना चाहते हैं इन्हे अपने कम पर गर्व नही घराना होनी चाहिए क्या पहले जब शहादत को टेलेकास्ट नही किया गया तब वीरों का आदर देस्गह ने नही किया ---और मैं तो यहाँ तक मानती हूँ की ये लोग ही आतंकियों को उकसाने का भी अपराध करते हैं और ऐसा जघन्य अपराध जिसकी सज़ा भी कोई इन्हें नही देता शायद इनके न्यूज़ परोसने ढंग को देख कर दुश्मन नै से नै आतंकी योजनायें बनते है और इन्हें फ़िर एक कवरेज़ का मौका मिल जाता है कोई तो इस ब्लॉग को पढ़े और शहादत का लाइव टेलेकास्ट रोके ----अमल्य और महान शहादत इनके ओछे लफ्जों से मैली न हो मेरे देश के वीरों की आत्मा को मेरा प्रणाम ---वो हमें अपनी नुमायश के लिए क्षम्मा करें ----भारत और भारत बासियों को सदबुधि मिले मेरे देश को अपरिपक्वा पत्रकारों के बचकाने अपराधों कोई बचाए और हम आतक की लडाई समझदारी और सूझ बुझ से लड़ें ---जय हिंद

शुक्रवार, 5 सितंबर 2008

दर्द

प्रभु की कृपा का अनुभव करने के लिए भी प्रभु की कृपा का ही आसरा लेना ज़रूरी है --ये बड़ी विडम्बना है प्रभु जो कोई दर्द जानते ही नही हैं या जान कर भी जानना नही चाहते क्योंकिधर्मवीर भारती ने लिखा भी है -
तुम क्याजानोगे ओ !प्रभु उन गत्यवरोधों का दर्द
तुमने कब झेली संक्रांति /कैसे तरुनाई मैं ही घुट मर जाते हैं विश्वास /प्राणों की समिधायें जम कर हो जाती हैं सर्द
सो ऐसे प्रभु से उम्मीद न रखो जो आंसुओं का कुछ ज्यादा ही सस्ता भावः लगाते हों औरजिन्हें मनाने को पूरा जीवन भी कम पड़ता हो फ़िर भी जैसे उडि जहाज को पंछी फ़िर जहाज पर आवे उसी तरह की दशा है कि 'जाऊं कहाँ तजि चरण तिहारे 'सो प्रतीक्षा ही प्रतीक्षा है आगे उसकी इच्छा है सो कबहुँकमातअवसर सुधि भी हमारी सुधि भी कथाहमारीकहीं कोई hamari भी सुधि दिला सके क्योंकि prabhu को to विश्वास ही नही आता होगा की कोई tirepan sal bitakar भी ऐसा rita होगा की ख़ुद से नफरत हो जाए zindagi इस मोड़ पर aajaye की न जिया जाए न mra जाए सो इस नरक सेबचने का कोई sadhan to dhundhna ही पड़ेगा aaspas to ऐसी duniya है की मन vyakul रहता है ----prabhu sharan का ही aasara है क्योंकि zindagi ने zab chuaa tab fasla रख कर chhuaa------zindagi का गीत कुछ इस तरह कठिन था की किसी को समझ नही आया सो एक ankahi dastaan को leker ही jahan से kuunch करना होगा इसलिए prabhu को manana बहुत ही ज़रूरी हो गया है ------तुम janat सब antaryami karni kachu न करी अब मेरी rakho laz hari ----

बुधवार, 3 सितंबर 2008

गुरु कृपा

ज़िन्दगी की शुरुआत ही गुरु से होती है प्रथम गुरु मां होती है फ़िर ये जो ishawar कहिये या गुरु कहिये मां ही और सब गुरुजनों से मिलवाती हैं कदम कदम पर गुरु हमारी रह dikhane को खड़े मिल्जाते हैं ये बस कृपा का ही jadu ज़िन्दगी भर चलता रहता है .'मानस की काली मावस को गुरु गुरुपूनों से धोते रहते हैं और अपनीकरुना से हर लोहे को परस बनाते रहते हैं भारत जैसे गौरवशाली देश मैं जहाँ गुरु शिष्य परम्परा को पवित्र माना जाता है दुःख होता ये देख क कि आज की बदलतीदुनिया मैं गुरु शब्द का भी अर्थ बदल गया है ---गुरु शब्द मैं से गरिमा को निकाल देने मैं कुछ तो वक्त की मज़बूरी है और कुछ शासन की
अरे चौंक गए भइयाहमारे प्रदेश मैं तो शिक्षा कर्मी होते हैं न गुरु न गरिमा किसी का कोई झनझट ही नही कैसा विचित्र संबोधन है और कैसी विडम्बना है किपूरा समाज उसे बिना किसी एतराज़ के स्वीकार करता है अरे vidya से जब हम शिक्षा पर आगये तब भी भी किसी के कान पर जूं नही रेंगी अगर शिक्षा ही होती तो हमारी विद्या का क्याऔर ये क्यों कहते कि गुरु गृह गए पढ़न रघुराई अल्प काल विद्या सब पाई ---खैर ये तो कुछ ज़्यादा ही हो गई -----अब तोसब वक्त की बलिहारी है कहीं शिक्षाकर्मी हैं तो कहीं गुरूजी हैं हैं सब निरीह !कहाँ का मान कहाँ की शान अब तो जैसे और धंधे वैसा ही ये शिक्षाकर्मी का धंधा है रही बात गुरु की तो गुरु शब्द के तो अनेक अर्थ हो गए ---"बड़ा गुरु है !---अरे गुरु हमसे क्याछुपा है अरे गुरु !!!!!बगैरह वगैरह ----शायद मुझसे ज़्यादा प्रसग तो आपको याद आगये होंगे इस सबके वावजूद विडंवना यह की हमें इस विकलांग श्रध्दा के दौर मैं भी अपने बच्चों को unhi तथाकथित गुरु या शिक्षाकर्मी की शरण मैं भेजना पड़ता है ---और फ़िर हमारी पीढी अगर खोई खोई सी रहे तो अचरज कैसा !आख़िर मानदंड तो हमने ही तय किए हैं न अपनी संवेदना कोबहरा बनानेवाले भी तो हमीं हैं न फ़िर कविता याद आती है सचमुच बहुत देर तक सोये इदह्र यहाँ से उधर वहां तक धुप चढ़ गई कहाँ कहाँ तक /लोगों ने इतिहास रच दिए हमने सब संबोधन खोये /सचमुच बहुत देर तक सोये -----