प्रभु की कृपा का अनुभव करने के लिए भी प्रभु की कृपा का ही आसरा लेना ज़रूरी है --ये बड़ी विडम्बना है प्रभु जो कोई दर्द जानते ही नही हैं या जान कर भी जानना नही चाहते क्योंकिधर्मवीर भारती ने लिखा भी है -
तुम क्याजानोगे ओ !प्रभु उन गत्यवरोधों का दर्द
तुमने कब झेली संक्रांति /कैसे तरुनाई मैं ही घुट मर जाते हैं विश्वास /प्राणों की समिधायें जम कर हो जाती हैं सर्द
सो ऐसे प्रभु से उम्मीद न रखो जो आंसुओं का कुछ ज्यादा ही सस्ता भावः लगाते हों औरजिन्हें मनाने को पूरा जीवन भी कम पड़ता हो फ़िर भी जैसे उडि जहाज को पंछी फ़िर जहाज पर आवे उसी तरह की दशा है कि 'जाऊं कहाँ तजि चरण तिहारे 'सो प्रतीक्षा ही प्रतीक्षा है आगे उसकी इच्छा है सो कबहुँकमातअवसर सुधि भी हमारी सुधि भी कथाहमारीकहीं कोई hamari भी सुधि दिला सके क्योंकि prabhu को to विश्वास ही नही आता होगा की कोई tirepan sal bitakar भी ऐसा rita होगा की ख़ुद से नफरत हो जाए zindagi इस मोड़ पर aajaye की न जिया जाए न mra जाए सो इस नरक सेबचने का कोई sadhan to dhundhna ही पड़ेगा aaspas to ऐसी duniya है की मन vyakul रहता है ----prabhu sharan का ही aasara है क्योंकि zindagi ने zab chuaa tab fasla रख कर chhuaa------zindagi का गीत कुछ इस तरह कठिन था की किसी को समझ नही आया सो एक ankahi dastaan को leker ही jahan से kuunch करना होगा इसलिए prabhu को manana बहुत ही ज़रूरी हो गया है ------तुम janat सब antaryami karni kachu न करी अब मेरी rakho laz hari ----
शुक्रवार, 5 सितंबर 2008
बुधवार, 3 सितंबर 2008
गुरु कृपा
ज़िन्दगी की शुरुआत ही गुरु से होती है प्रथम गुरु मां होती है फ़िर ये जो ishawar कहिये या गुरु कहिये मां ही और सब गुरुजनों से मिलवाती हैं कदम कदम पर गुरु हमारी रह dikhane को खड़े मिल्जाते हैं ये बस कृपा का ही jadu ज़िन्दगी भर चलता रहता है .'मानस की काली मावस को गुरु गुरुपूनों से धोते रहते हैं और अपनीकरुना से हर लोहे को परस बनाते रहते हैं भारत जैसे गौरवशाली देश मैं जहाँ गुरु शिष्य परम्परा को पवित्र माना जाता है दुःख होता ये देख कर कि आज की बदलतीदुनिया मैं गुरु शब्द का भी अर्थ बदल गया है ---गुरु शब्द मैं से गरिमा को निकाल देने मैं कुछ तो वक्त की मज़बूरी है और कुछ शासन की
अरे चौंक गए भइयाहमारे प्रदेश मैं तो शिक्षा कर्मी होते हैं न गुरु न गरिमा किसी का कोई झनझट ही नही कैसा विचित्र संबोधन है और कैसी विडम्बना है किपूरा समाज उसे बिना किसी एतराज़ के स्वीकार करता है अरे vidya से जब हम शिक्षा पर आगये तब भी भी किसी के कान पर जूं नही रेंगी अगर शिक्षा ही होती तो हमारी विद्या का क्याऔर ये क्यों कहते कि गुरु गृह गए पढ़न रघुराई अल्प काल विद्या सब पाई ---खैर ये तो कुछ ज़्यादा ही हो गई -----अब तोसब वक्त की बलिहारी है कहीं शिक्षाकर्मी हैं तो कहीं गुरूजी हैं हैं सब निरीह !कहाँ का मान कहाँ की शान अब तो जैसे और धंधे वैसा ही ये शिक्षाकर्मी का धंधा है रही बात गुरु की तो गुरु शब्द के तो अनेक अर्थ हो गए ---"बड़ा गुरु है !---अरे गुरु हमसे क्याछुपा है अरे गुरु !!!!!बगैरह वगैरह ----शायद मुझसे ज़्यादा प्रसग तो आपको याद आगये होंगे इस सबके वावजूद विडंवना यह की हमें इस विकलांग श्रध्दा के दौर मैं भी अपने बच्चों को unhi तथाकथित गुरु या शिक्षाकर्मी की शरण मैं भेजना पड़ता है ---और फ़िर हमारी पीढी अगर खोई खोई सी रहे तो अचरज कैसा !आख़िर मानदंड तो हमने ही तय किए हैं न अपनी संवेदना कोबहरा बनानेवाले भी तो हमीं हैं न फ़िर कविता याद आती है सचमुच बहुत देर तक सोये इदह्र यहाँ से उधर वहां तक धुप चढ़ गई कहाँ कहाँ तक /लोगों ने इतिहास रच दिए हमने सब संबोधन खोये /सचमुच बहुत देर तक सोये -----
अरे चौंक गए भइयाहमारे प्रदेश मैं तो शिक्षा कर्मी होते हैं न गुरु न गरिमा किसी का कोई झनझट ही नही कैसा विचित्र संबोधन है और कैसी विडम्बना है किपूरा समाज उसे बिना किसी एतराज़ के स्वीकार करता है अरे vidya से जब हम शिक्षा पर आगये तब भी भी किसी के कान पर जूं नही रेंगी अगर शिक्षा ही होती तो हमारी विद्या का क्याऔर ये क्यों कहते कि गुरु गृह गए पढ़न रघुराई अल्प काल विद्या सब पाई ---खैर ये तो कुछ ज़्यादा ही हो गई -----अब तोसब वक्त की बलिहारी है कहीं शिक्षाकर्मी हैं तो कहीं गुरूजी हैं हैं सब निरीह !कहाँ का मान कहाँ की शान अब तो जैसे और धंधे वैसा ही ये शिक्षाकर्मी का धंधा है रही बात गुरु की तो गुरु शब्द के तो अनेक अर्थ हो गए ---"बड़ा गुरु है !---अरे गुरु हमसे क्याछुपा है अरे गुरु !!!!!बगैरह वगैरह ----शायद मुझसे ज़्यादा प्रसग तो आपको याद आगये होंगे इस सबके वावजूद विडंवना यह की हमें इस विकलांग श्रध्दा के दौर मैं भी अपने बच्चों को unhi तथाकथित गुरु या शिक्षाकर्मी की शरण मैं भेजना पड़ता है ---और फ़िर हमारी पीढी अगर खोई खोई सी रहे तो अचरज कैसा !आख़िर मानदंड तो हमने ही तय किए हैं न अपनी संवेदना कोबहरा बनानेवाले भी तो हमीं हैं न फ़िर कविता याद आती है सचमुच बहुत देर तक सोये इदह्र यहाँ से उधर वहां तक धुप चढ़ गई कहाँ कहाँ तक /लोगों ने इतिहास रच दिए हमने सब संबोधन खोये /सचमुच बहुत देर तक सोये -----
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