जश्ने आज़ादी मनाने का वक्त आपहुंचा है ;चलो एक बार फ़िर रस्म अदायगीकरें ------वो आज़ादी जिसे पाने की जद्दो ज़हद से हम बेखबर है --बस सुना सुना है कि बड़ी कीमत दे कर आई है आज़ादी --और आज आजाद भारतके निवासी हम सब एक निश्चित दिन जश्न मानते हैं .मुझे तो लगता है हम भारत के लोग जो रोज़ आकंठ जश्न मैं डूबे ही रहते हैं
आज तो हालात ये है कि ------आग लगे हमरी झुपडिया मैं ,हम गायें मल्हार --यानी मनोरंजन कि बढ़ आई है चारों तरफ़ खुशफहमियां हैं गीत नाच है मन को बहलाने के हज़ार साधन हैं और हमारा भोला भाला युवा अपने चंद
बहलाबों मैं भूला सा भरमा सा कभी अपने ब्रांडेड लिबास पर इठलाता है तो कभी अपने बेशकीमती गजेट्स पर फख्र ज़ाहिर करता है .कभी अपने पे पैकेज पर नाज़ करता है कभी अपनी पसंदीदा डिशेस का पक्का मुरीद बन कर ज़ाहिर करता है कि मैं भी आजाद हूँ ;मेरी अपनी ख़ुद अपने हाथों से बनाई जिंदगी जो कि इतनी ख़ूबसूरत है ---अरे ये जिंदगी तो अपने आप मैं एक जश्न है क्यों कि आज़ादी है हमें चाहें तो पिज्जा खाएं चाहें ----बर्गर चाहें जिस महगे से महगे रेस्तरां मैं जायें चाहें जब हजारों रुपया उडाएं --यही तो असली जिंदगी है ---अब इसमें कहाँ है आज़ादी का जश्न और कहाँ है देश का स्वप्न -----अरे हम तो ऐसे फिरंगियों कि नौकरी कर रहे हैं जो हमारे त्यूहार जाने न हमारा गौरव माने जिस यांत्रिकता से ऊब चुके हैं पछिम वाले उसी यांत्रिकता मैं हमें ढकेलने की तईआरी है .फ़िर आप ही बताओ कैसा जश्न और कैसी आज़ादी ?अब तो पाउचों के ढेर मैं दबी हमारी नन्ही नन्ही खुशियाँ हमारे सामने दम न तोड़ रही होती और बिना ये हिसाब लगाये की इस ब्रांडेड जिंदगी के छलाबे मैं हमने क्याक्या खोया हैहम इस कदर न बदल जाते --जहाँ हमारे देश मैं जिंदगी निकल जाती थी कोई किसी कीअसली हैसियत नही नाप पाता था वहीं आज नौकरी लगी और कल से बेटे का पे पकेज रिश्तेदारी बुलेटिन की चर्चाओं मैं होता है .कैसे बदल गए हमारे जीवन मूल्य ?? कहाँ गई हमारी विरासत की वो कहावत की 'बंधी मुट्ठी लाख की ,खुल गई तो खाक की ' ----अरे मैं भी कहाँ की चर्चा ले बैठी ?आज तो ज़माना बदल गया है न !जश्ने आज़ादी तो है -----मगरजश्न ऐ आज़ादी नही है ---शायर दानिश ने क्या मोजुं शेर कहा है -'खुश नज़र आते हैं गुल ,गुलदान मैं /किस कदर गाफिल हैं झूठी शान मैं '----चलिए आज आजादी के बहने आज़ादी की बात निकली तो कुछ दर्द का परचम हमने भी लहरा दिया सही है अपने अपने परचम हैं .ये भी क्या कम है .
शनिवार, 26 जुलाई 2008
बुधवार, 23 जुलाई 2008
यादों का सावन
सुना है की सावन मैं झडी लग जाती है तो उसके साथ यादों की भी बरसात होती है --मुझे याद आरहा है वो सावन जब नानी से कह कह कर झूला डलवाते थे ,और खाना पीना पढ़ना सब उसी झूले पर होता था .नानी याद कर कर के गीत सुनाती थी झूलती मै थी और गाने नानी गाती थी कहती कि बिना गीत का झूला अशुभ होता है और शगुन की तो मानो थोक दुकान थी नानी !बिना अतिरिक्त पैसे खर्च किए वो सावन मनता था कि आज भी भिगोता रहता है कहीं भी कभी भी जब नानी की याद आ जाए .मानो मन की धरती आर्द्र हो उठती है ----कहाँ गई जीवन की वो अद्भुत कलाएं जब उम् हर वक्त भीगने -भिगोने को तयार रह्ते थे उमंग उल्लास को दूर दूर से लाक्ते थे आज भी वही सावन है वही पुरवा -पछुआ हैइ लेकीन सावन की बौछारों मैं भीगने का मन है न झूला झूलने का ----कहाँ खोया सावन का अंदाज़ आज तो अंतहीन इंतजार है ---कोई हमें भी बुलाये ;कोई हमें भी झुलाये कोई तो कहे की बेटी आ सारी व्यस्तताओं को भूल कर आ ----मगर कहाँ गई इसरा र की भाषा कहाँ गई शगुन मानती नानियाँ - शायद सब आज की उपलब्धियों मै शहीद होगयीं न रहा सावन न झूले ---बचा है तो बस ये की अरे चलो फोन कर लिया छुटी हुई और मन को समझा लिया की हमने तो खूब कहा लियाा आज कल के बच्चों को फुर्सतकहाँ----और मन से भी छिपा लिया गज़ब मजबूरियां है------हर बार सोचती हूँ इस बार सावन मैं पहले वाले अंदाज़ मै ही जाउंगी ---मगर नही जा पाती शंकर जी की चेतावनी याद आजाती है ---जो बिन बोले जाहू भवानी -----अरे नही मै तो यूँही कह रही मुझे तो माँ लगभग हर रोज़ बुलातीं हैं और हजारों बार कहती हैं कि आया कर बेटा ! मगर ये मेरा ही मन मैला हो गया है जो अनकही बातों को सुनता रहता है ---आएगी तो बड़ी बहागाम्भाग सी मच जायेगी ---मार कम फ़ैल जाएगा और फ़िर खर्चा होगा सो अलग अभी तो छोटी वाली आई थी हर रोज़ कोई न कोई खर्च खाए जाता अही अब कौन आता सावण मै बूढी बेटियों को कोंन बुलाता है -------नही ये सब तो मै कह रही हूँ मां की मम्मता तो खरे सोने की तरह आज भी दमकती है तभी तो हर जन्मदिन पर फोन आता है -----सावन लता है माँ का हर फोन बौछारें भी लता है माका हर फोन मगर झूला झुलाती हैं नानी आज भी नानी हर सावन मैं झूला डालती है मै रोज़ अपनी जिंदगी की हजारों व्यस्तता से समय चुरा कर झूले पर बैठी होती हूँ ---ये और बात है कि लोगों को लगता है मै काम कर रही हूँ ;मै खाना बना रही हूँ ;मैं ड्राइविंग कर रही हूँ --मगर पूरे सावन मैं तो झूले पर बैठी होती हूँ और मेरी नानी शगुन के गीत गाती रहती है तभी सावन जिंदा है उस सावन की बदौलत मैं जिंदा हूँ और जिंदा है मन के आँगन का अंतहीन गीलापन -------
शनिवार, 12 जुलाई 2008
मन आँगन
निर्व्याख्या उदासी के पहरे मैं पहरों बिताने वाला ये तुम्हारा गुनगुना सा मन कुछ ज़्यादा ही नक्शे देता है कोई पूछे न पूछे;सबको खामख्वाह अपने ग़मों का पता देता है ;---तुम पर हर अहसास तुम्हारा भारी है ---जी से दानिश कैसा रोग लगाया है ---और इस तरह एक अजीब सी फितरत लिए जिए जाते हुए अब आकर निरर्थकता का अनुभव हो रहा है ---की न खुदा ही मिला न विसाले सनम ---लेकिन सबकी कमोबेश यही हालत है ---किसको क्या मिलता है शायद ये बात सच है शायर दानिश की कि तबियत ही कुछ ऐसी पी है उसने /न हो कोई उलझन तो उलझा रहेगा ये आज के इन्सान का सच है .मगर अनकही अकारण उदासी जब जिंदगी को फरेब देने लगे तो जीने का अंदाज़ बदल देना चाहिए -----
सुनिए सबकी कहिये न कछु रहिये इमि या मन बगर मैं
करिए व्रत नेम सचाई लिए जिन सों तरिये भवसागर मैं
मिलिए सबसों दुर्भाव बिना रहिये सत्संग उजागर मे
रसखान गोविन्दहि यों भजिये जिमि नागरि कौ चित गगरि मैं
बिना प्रभु की शरण मे जाए उदासी दूर नही हो सकती क्योंकि --दिल को कैसे करार आता है ये लिखा ही नहीं किताबों मैं (दानिश)
सुनिए सबकी कहिये न कछु रहिये इमि या मन बगर मैं
करिए व्रत नेम सचाई लिए जिन सों तरिये भवसागर मैं
मिलिए सबसों दुर्भाव बिना रहिये सत्संग उजागर मे
रसखान गोविन्दहि यों भजिये जिमि नागरि कौ चित गगरि मैं
बिना प्रभु की शरण मे जाए उदासी दूर नही हो सकती क्योंकि --दिल को कैसे करार आता है ये लिखा ही नहीं किताबों मैं (दानिश)
शुक्रवार, 11 जुलाई 2008
मौत की मुनादी
जीवन की सांझ आने से पहले कुछ आवाजें मन को झकझोर कर रख देती हैं .चरों और से एक अंतर्नाद सुनाई देता है ;ज़ल्दी करो ज़ल्दी करो आज के तात्कालिक कम निपटाओ और ये ज़ल्दी कभी ख़त्म नही होती ---तुलसी ने लिखा है न"डासत ही गई बीत निशा न कबहू मैं नाथ नींद भरि सोयो "---सचमुच बिछाते बिछाते रात बीत गई और न नींद आइ न चैन मिला .सभी का यही हाल है जीने की तयारी मैं जीवन निकल गया .एक दिन अचानक कुछ शोर सा सुने दिया ----क्या हो सकता है मन मैं इतना भय क्यों है ये आवाजें कैसी हैं ?अरे !ये तो अपनी ही मौत की मुनादी हो रही है ----तुमने ये ये किया इसलिए जिंदगी देने वाला तुमसे खफा हो गया और ये लो आज तम्हारी मौत की मुनादी सुनाई जा रही है ---सावधान !(डर गई क्या /अरे !डरना क्यों ?ये तो बड़ी बेकार सी मुनादी है रे !एक ही बार मे किस्सा खत्म हो जाएगा -----मगर जिं दगी भर तो बिना आहट के मरते रहे उसका क्या चलो अच्छा हुआ टुकड़े टुकड़े मरने से तो पीछा छोटेगा कबीर ने लिखा है न 'मरने से सब जग डरे मेरे मन आनंद कब मरिहों कब भेटिहों पूरण परमानन्द .
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