बुधवार, 23 जुलाई 2008

यादों का सावन

सुना है की सावन मैं झडी लग जाती है तो उसके साथ यादों की भी बरसात होती है --मुझे याद आरहा है वो सावन जब नानी से कह कह कर झूला डलवाते थे ,और खाना पीना पढ़ना सब उसी झूले पर होता था .नानी याद कर कर के गीत सुनाती थी झूलती मै थी और गाने नानी गाती थी कहती कि बिना गीत का झूला अशुभ होता है और शगुन की तो मानो थोक दुकान थी नानी !बिना अतिरिक्त पैसे खर्च किए वो सावन मनता था कि आज भी भिगोता रहता है कहीं भी कभी भी जब नानी की याद आ जाए .मानो मन की धरती आर्द्र हो उठती है ----कहाँ गई जीवन की वो अद्भुत कलाएं जब उम् हर वक्त भीगने -भिगोने को तयार रह्ते थे उमंग उल्लास को दूर दूर से लाक्ते थे आज भी वही सावन है वही पुरवा -पछुआ हैइ लेकीन सावन की बौछारों मैं भीगने का मन है न झूला झूलने का ----कहाँ खोया सावन का अंदाज़ आज तो अंतहीन इंतजार है ---कोई हमें भी बुलाये ;कोई हमें भी झुलाये कोई तो कहे की बेटी आ सारी व्यस्तताओं को भूल कर आ ----मगर कहाँ गई इसरा र की भाषा कहाँ गई शगुन मानती नानियाँ - शायद सब आज की उपलब्धियों मै शहीद होगयीं न रहा सावन न झूले ---बचा है तो बस ये की अरे चलो फोन कर लिया छुटी हुई और मन को समझा लिया की हमने तो खूब कहा लिया आज कल के बच्चों को फुर्सतकहाँ----और मन से भी छिपा लिया गज़ब मजबूरियां है------हर बार सोचती हूँ इस बार सावन मैं पहले वाले अंदाज़ मै ही जाउंगी ---मगर नही जा पाती शंकर जी की चेतावनी याद आजाती है ---जो बिन बोले जाहू भवानी -----अरे नही मै तो यूँही कह रही मुझे तो माँ लगभग हर रोज़ बुलातीं हैं और हजारों बार कहती हैं कि आया कर बेटा ! मगर ये मेरा ही मन मैला हो गया है जो अनकही बातों को सुनता रहता है ---आएगी तो बड़ी बहागाम्भाग सी मच जायेगी ---मार कम फ़ैल जाएगा और फ़िर खर्चा होगा सो अलग अभी तो छोटी वाली आई थी हर रोज़ कोई न कोई खर्च खाए जाता अही अब कौन आता सावण मै बूढी बेटियों को कोंन बुलाता है -------नही ये सब तो मै कह रही हूँ मां की मम्मता तो खरे सोने की तरह आज भी दमकती है तभी तो हर जन्मदिन पर फोन आता है -----सावन लता है माँ का हर फोन बौछारें भी लता है माका हर फोन मगर झूला झुलाती हैं नानी आज भी नानी हर सावन मैं झूला डालती है मै रोज़ अपनी जिंदगी की हजारों व्यस्तता से समय चुरा कर झूले पर बैठी होती हूँ ---ये और बात है कि लोगों को लगता है मै काम कर रही हूँ ;मै खाना बना रही हूँ ;मैं ड्राइविंग कर रही हूँ --मगर पूरे सावन मैं तो झूले पर बैठी होती हूँ और मेरी नानी शगुन के गीत गाती रहती है तभी सावन जिंदा है उस सावन की बदौलत मैं जिंदा हूँ और जिंदा है मन के आँगन का अंतहीन गीलापन -------

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