शुक्रवार, 11 जुलाई 2008
मौत की मुनादी
जीवन की सांझ आने से पहले कुछ आवाजें मन को झकझोर कर रख देती हैं .चरों और से एक अंतर्नाद सुनाई देता है ;ज़ल्दी करो ज़ल्दी करो आज के तात्कालिक कम निपटाओ और ये ज़ल्दी कभी ख़त्म नही होती ---तुलसी ने लिखा है न"डासत ही गई बीत निशा न कबहू मैं नाथ नींद भरि सोयो "---सचमुच बिछाते बिछाते रात बीत गई और न नींद आइ न चैन मिला .सभी का यही हाल है जीने की तयारी मैं जीवन निकल गया .एक दिन अचानक कुछ शोर सा सुने दिया ----क्या हो सकता है मन मैं इतना भय क्यों है ये आवाजें कैसी हैं ?अरे !ये तो अपनी ही मौत की मुनादी हो रही है ----तुमने ये ये किया इसलिए जिंदगी देने वाला तुमसे खफा हो गया और ये लो आज तम्हारी मौत की मुनादी सुनाई जा रही है ---सावधान !(डर गई क्या /अरे !डरना क्यों ?ये तो बड़ी बेकार सी मुनादी है रे !एक ही बार मे किस्सा खत्म हो जाएगा -----मगर जिं दगी भर तो बिना आहट के मरते रहे उसका क्या चलो अच्छा हुआ टुकड़े टुकड़े मरने से तो पीछा छोटेगा कबीर ने लिखा है न 'मरने से सब जग डरे मेरे मन आनंद कब मरिहों कब भेटिहों पूरण परमानन्द .
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