बुधवार, 3 सितंबर 2008

गुरु कृपा

ज़िन्दगी की शुरुआत ही गुरु से होती है प्रथम गुरु मां होती है फ़िर ये जो ishawar कहिये या गुरु कहिये मां ही और सब गुरुजनों से मिलवाती हैं कदम कदम पर गुरु हमारी रह dikhane को खड़े मिल्जाते हैं ये बस कृपा का ही jadu ज़िन्दगी भर चलता रहता है .'मानस की काली मावस को गुरु गुरुपूनों से धोते रहते हैं और अपनीकरुना से हर लोहे को परस बनाते रहते हैं भारत जैसे गौरवशाली देश मैं जहाँ गुरु शिष्य परम्परा को पवित्र माना जाता है दुःख होता ये देख क कि आज की बदलतीदुनिया मैं गुरु शब्द का भी अर्थ बदल गया है ---गुरु शब्द मैं से गरिमा को निकाल देने मैं कुछ तो वक्त की मज़बूरी है और कुछ शासन की
अरे चौंक गए भइयाहमारे प्रदेश मैं तो शिक्षा कर्मी होते हैं न गुरु न गरिमा किसी का कोई झनझट ही नही कैसा विचित्र संबोधन है और कैसी विडम्बना है किपूरा समाज उसे बिना किसी एतराज़ के स्वीकार करता है अरे vidya से जब हम शिक्षा पर आगये तब भी भी किसी के कान पर जूं नही रेंगी अगर शिक्षा ही होती तो हमारी विद्या का क्याऔर ये क्यों कहते कि गुरु गृह गए पढ़न रघुराई अल्प काल विद्या सब पाई ---खैर ये तो कुछ ज़्यादा ही हो गई -----अब तोसब वक्त की बलिहारी है कहीं शिक्षाकर्मी हैं तो कहीं गुरूजी हैं हैं सब निरीह !कहाँ का मान कहाँ की शान अब तो जैसे और धंधे वैसा ही ये शिक्षाकर्मी का धंधा है रही बात गुरु की तो गुरु शब्द के तो अनेक अर्थ हो गए ---"बड़ा गुरु है !---अरे गुरु हमसे क्याछुपा है अरे गुरु !!!!!बगैरह वगैरह ----शायद मुझसे ज़्यादा प्रसग तो आपको याद आगये होंगे इस सबके वावजूद विडंवना यह की हमें इस विकलांग श्रध्दा के दौर मैं भी अपने बच्चों को unhi तथाकथित गुरु या शिक्षाकर्मी की शरण मैं भेजना पड़ता है ---और फ़िर हमारी पीढी अगर खोई खोई सी रहे तो अचरज कैसा !आख़िर मानदंड तो हमने ही तय किए हैं न अपनी संवेदना कोबहरा बनानेवाले भी तो हमीं हैं न फ़िर कविता याद आती है सचमुच बहुत देर तक सोये इदह्र यहाँ से उधर वहां तक धुप चढ़ गई कहाँ कहाँ तक /लोगों ने इतिहास रच दिए हमने सब संबोधन खोये /सचमुच बहुत देर तक सोये -----

शुक्रवार, 29 अगस्त 2008

तुम जियो हजारों साल !

प्रभु की कृपा तुम पर हर वक्त बरसती रहे ,तुम्हारी ज़िन्दगी मैं फूल ही फूल बिछे हों .कोई दुःख तुम्हारे पास से हो कर भी निकले ---मेरे बच्चे सात समंदर पर बैठी येतेरी मान क्या दुआ करे की तेरी ज़िन्दगी zadu की तरह चले ---एक bhagwan का ही bharosa है की सात समंदर पर बैठे मेरे बच्चे का saya बने रहेंगे .मान to बस अपने kaleze को terei aashish से भरा एक tukda manti है ---siway shubhakamna के और क्या दे सकती है ---वो हज़ार हज़ार यादें जो बचपन से लेकर आज तक वो हज़ार हज़ार sapne जो तेरे लिए देखे हैं उन प्रभु की कृपा का भरोसा-- है बस ज़रा सी बातकी अब मुझसे भजन नही बनता है फ़िर प्रभु की कृपा -का -भी भरोसा है सुन आज - ---- -----aur sun aaj तेरी बर्थडे पर कोई काम i नही था मुझे करने को तू कब बड़ा हो गया कब दूर चला गया ये अहसा अबजाकर हुआ जब pas रहता था तो ये मां तुझे कुछ कुछ पढने के लिए kahti या डांडती ही रहती थी --याद आता है वो प्रसंग जब नंदबाबा कृष्ण के मथुरा चले जाने पर यशोदा से कहते हैं ----जब तूमारिबू ही करत ---अर्थात जब कृष्ण गोकुल मैं रहता था तब तू मारती ही रहती थी और यशोदा बिलख कर कहती है -----"फ़िर ब्रिज बसहु गोकुलनाथ ---बहुरि तुम्हे जगाय पथ्वहुन गोधनं के साथ
बरजों माखन खात कबहूँ देहूं देन लुटाय ----- मैं तुम्हे माखन खाने से रोकूंगी लुटाने से लेकिन कन्हैया एक बार तो गोकुल आजा ----यही आर्त पुकार हर मां की है जिस जिस का बेटा बड़ा हो कर ज़िन्दगी की कर्मभूमि मैं चला गया है हर वक्त वो मां अपने बच्चों के sath ही होती है फ़िर ये समन्दरों की दूरियां क्या लगती हैं ?---के मेरे लाल जहाँ भी रहे खुश रह तू हमेशा तेरी हर bala कोअपने सर ले कर अपने लाल के हज़ार हज़ार सदकेउतारती है कन्हैया !हर ज़गह तुझे शुभकामनाओं का माखन मिलता रहेगा हर समय मां की दुआओं का साया तेरे सर पर रहेगा औरईश्वर कृपा का मयूर पंखसदा तुझे राह बताता रहेगा----

शनिवार, 26 जुलाई 2008

आज़ादी की रस्म ओ रिवाज़ j

जश्ने आज़ादी मनाने का वक्त आपहुंचा है ;चलो एक बार फ़िर रस्म अदायगीकरें ------वो आज़ादी जिसे पाने की जद्दो ज़हद से हम बेखबर है --बस सुना सुना है कि बड़ी कीमत दे कर आई है आज़ादी --और आज आजाद भारतके निवासी हम सब एक निश्चित दिन जश्न मानते हैं .मुझे तो लगता है हम भारत के लोग जो रोज़ आकंठ जश्न मैं डूबे ही रहते हैं
आज तो हालात ये है कि ------आग लगे हमरी झुपडिया मैं ,हम गायें मल्हार --यानी मनोरंजन कि बढ़ आई है चारों तरफ़ खुशफहमियां हैं गीत नाच है मन को बहलाने के हज़ार साधन हैं और हमारा भोला भाला युवा अपने चंद
बहलाबों मैं भूला सा भरमा सा कभी अपने ब्रांडेड लिबास पर इठलाता है तो कभी अपने बेशकीमती गजेट्स पर फख्र ज़ाहिर करता है .कभी अपने पे पैकेज पर नाज़ करता है कभी अपनी पसंदीदा डिशेस का पक्का मुरीद बन कर ज़ाहिर करता है कि मैं भी आजाद हूँ ;मेरी अपनी ख़ुद अपने हाथों से बनाई जिंदगी जो कि इतनी ख़ूबसूरत है ---अरे ये जिंदगी तो अपने आप मैं एक जश्न है क्यों कि आज़ादी है हमें चाहें तो पिज्जा खाएं चाहें ----बर्गर चाहें जिस महगे से महगे रेस्तरां मैं जायें चाहें जब हजारों रुपया उडाएं --यही तो असली जिंदगी है ---अब इसमें कहाँ है आज़ादी का जश्न और कहाँ है देश का स्वप्न -----अरे हम तो ऐसे फिरंगियों कि नौकरी कर रहे हैं जो हमारे त्यूहार जाने न हमारा गौरव माने जिस यांत्रिकता से ऊब चुके हैं पछिम वाले उसी यांत्रिकता मैं हमें ढकेलने की तईआरी है .फ़िर आप ही बताओ कैसा जश्न और कैसी आज़ादी ?अब तो पाउचों के ढेर मैं दबी हमारी नन्ही नन्ही खुशियाँ हमारे सामने दम न तोड़ रही होती और बिना ये हिसाब लगाये की इस ब्रांडेड जिंदगी के छलाबे मैं हमने क्याक्या खोया हैहम इस कदर न बदल जाते --जहाँ हमारे देश मैं जिंदगी निकल जाती थी कोई किसी कीअसली हैसियत नही नाप पाता था वहीं आज नौकरी लगी और कल से बेटे का पे पकेज रिश्तेदारी बुलेटिन की चर्चाओं मैं होता है .कैसे बदल गए हमारे जीवन मूल्य ?? कहाँ गई हमारी विरासत की वो कहावत की 'बंधी मुट्ठी लाख की ,खुल गई तो खाक की ' ----अरे मैं भी कहाँ की चर्चा ले बैठी ?आज तो ज़माना बदल गया है न !जश्ने आज़ादी तो है -----मगरजश्न ऐ आज़ादी नही है ---शायर दानिश ने क्या मोजुं शेर कहा है -'खुश नज़र आते हैं गुल ,गुलदान मैं /किस कदर गाफिल हैं झूठी शान मैं '----चलिए आज आजादी के बहने आज़ादी की बात निकली तो कुछ दर्द का परचम हमने भी लहरा दिया सही है अपने अपने परचम हैं .ये भी क्या कम है .

बुधवार, 23 जुलाई 2008

यादों का सावन

सुना है की सावन मैं झडी लग जाती है तो उसके साथ यादों की भी बरसात होती है --मुझे याद आरहा है वो सावन जब नानी से कह कह कर झूला डलवाते थे ,और खाना पीना पढ़ना सब उसी झूले पर होता था .नानी याद कर कर के गीत सुनाती थी झूलती मै थी और गाने नानी गाती थी कहती कि बिना गीत का झूला अशुभ होता है और शगुन की तो मानो थोक दुकान थी नानी !बिना अतिरिक्त पैसे खर्च किए वो सावन मनता था कि आज भी भिगोता रहता है कहीं भी कभी भी जब नानी की याद आ जाए .मानो मन की धरती आर्द्र हो उठती है ----कहाँ गई जीवन की वो अद्भुत कलाएं जब उम् हर वक्त भीगने -भिगोने को तयार रह्ते थे उमंग उल्लास को दूर दूर से लाक्ते थे आज भी वही सावन है वही पुरवा -पछुआ हैइ लेकीन सावन की बौछारों मैं भीगने का मन है न झूला झूलने का ----कहाँ खोया सावन का अंदाज़ आज तो अंतहीन इंतजार है ---कोई हमें भी बुलाये ;कोई हमें भी झुलाये कोई तो कहे की बेटी आ सारी व्यस्तताओं को भूल कर आ ----मगर कहाँ गई इसरा र की भाषा कहाँ गई शगुन मानती नानियाँ - शायद सब आज की उपलब्धियों मै शहीद होगयीं न रहा सावन न झूले ---बचा है तो बस ये की अरे चलो फोन कर लिया छुटी हुई और मन को समझा लिया की हमने तो खूब कहा लिया आज कल के बच्चों को फुर्सतकहाँ----और मन से भी छिपा लिया गज़ब मजबूरियां है------हर बार सोचती हूँ इस बार सावन मैं पहले वाले अंदाज़ मै ही जाउंगी ---मगर नही जा पाती शंकर जी की चेतावनी याद आजाती है ---जो बिन बोले जाहू भवानी -----अरे नही मै तो यूँही कह रही मुझे तो माँ लगभग हर रोज़ बुलातीं हैं और हजारों बार कहती हैं कि आया कर बेटा ! मगर ये मेरा ही मन मैला हो गया है जो अनकही बातों को सुनता रहता है ---आएगी तो बड़ी बहागाम्भाग सी मच जायेगी ---मार कम फ़ैल जाएगा और फ़िर खर्चा होगा सो अलग अभी तो छोटी वाली आई थी हर रोज़ कोई न कोई खर्च खाए जाता अही अब कौन आता सावण मै बूढी बेटियों को कोंन बुलाता है -------नही ये सब तो मै कह रही हूँ मां की मम्मता तो खरे सोने की तरह आज भी दमकती है तभी तो हर जन्मदिन पर फोन आता है -----सावन लता है माँ का हर फोन बौछारें भी लता है माका हर फोन मगर झूला झुलाती हैं नानी आज भी नानी हर सावन मैं झूला डालती है मै रोज़ अपनी जिंदगी की हजारों व्यस्तता से समय चुरा कर झूले पर बैठी होती हूँ ---ये और बात है कि लोगों को लगता है मै काम कर रही हूँ ;मै खाना बना रही हूँ ;मैं ड्राइविंग कर रही हूँ --मगर पूरे सावन मैं तो झूले पर बैठी होती हूँ और मेरी नानी शगुन के गीत गाती रहती है तभी सावन जिंदा है उस सावन की बदौलत मैं जिंदा हूँ और जिंदा है मन के आँगन का अंतहीन गीलापन -------

शनिवार, 12 जुलाई 2008

मन आँगन

निर्व्याख्या उदासी के पहरे मैं पहरों बिताने वाला ये तुम्हारा गुनगुना सा मन कुछ ज़्यादा ही नक्शे देता है कोई पूछे न पूछे;सबको खामख्वाह अपने ग़मों का पता देता है ;---तुम पर हर अहसास तुम्हारा भारी है ---जी से दानिश कैसा रोग लगाया है ---और इस तरह एक अजीब सी फितरत लिए जिए जाते हुए अब आकर निरर्थकता का अनुभव हो रहा है ---की न खुदा ही मिला न विसाले सनम ---लेकिन सबकी कमोबेश यही हालत है ---किसको क्या मिलता है शायद ये बात सच है शायर दानिश की कि तबियत ही कुछ ऐसी पी है उसने /न हो कोई उलझन तो उलझा रहेगा ये आज के इन्सान का सच है .मगर अनकही अकारण उदासी जब जिंदगी को फरेब देने लगे तो जीने का अंदाज़ बदल देना चाहिए -----
सुनिए सबकी कहिये न कछु रहिये इमि या मन बगर मैं
करिए व्रत नेम सचाई लिए जिन सों तरिये भवसागर मैं
मिलिए सबसों दुर्भाव बिना रहिये सत्संग उजागर मे
रसखान गोविन्दहि यों भजिये जिमि नागरि कौ चित गगरि मैं
बिना प्रभु की शरण मे जाए उदासी दूर नही हो सकती क्योंकि --दिल को कैसे करार आता है ये लिखा ही नहीं किताबों मैं (दानिश)

शुक्रवार, 11 जुलाई 2008

मौत की मुनादी

जीवन की सांझ आने से पहले कुछ आवाजें मन को झकझोर कर रख देती हैं .चरों और से एक अंतर्नाद सुनाई देता है ;ज़ल्दी करो ज़ल्दी करो आज के तात्कालिक कम निपटाओ और ये ज़ल्दी कभी ख़त्म नही होती ---तुलसी ने लिखा है न"डासत ही गई बीत निशा न कबहू मैं नाथ नींद भरि सोयो "---सचमुच बिछाते बिछाते रात बीत गई और न नींद आइ न चैन मिला .सभी का यही हाल है जीने की तयारी मैं जीवन निकल गया .एक दिन अचानक कुछ शोर सा सुने दिया ----क्या हो सकता है मन मैं इतना भय क्यों है ये आवाजें कैसी हैं ?अरे !ये तो अपनी ही मौत की मुनादी हो रही है ----तुमने ये ये किया इसलिए जिंदगी देने वाला तुमसे खफा हो गया और ये लो आज तम्हारी मौत की मुनादी सुनाई जा रही है ---सावधान !(डर गई क्या /अरे !डरना क्यों ?ये तो बड़ी बेकार सी मुनादी है रे !एक ही बार मे किस्सा खत्म हो जाएगा -----मगर जिं दगी भर तो बिना आहट के मरते रहे उसका क्या चलो अच्छा हुआ टुकड़े टुकड़े मरने से तो पीछा छोटेगा कबीर ने लिखा है न 'मरने से सब जग डरे मेरे मन आनंद कब मरिहों कब भेटिहों पूरण परमानन्द .