निर्व्याख्या उदासी के पहरे मैं पहरों बिताने वाला ये तुम्हारा गुनगुना सा मन कुछ ज़्यादा ही नक्शे देता है कोई पूछे न पूछे;सबको खामख्वाह अपने ग़मों का पता देता है ;---तुम पर हर अहसास तुम्हारा भारी है ---जी से दानिश कैसा रोग लगाया है ---और इस तरह एक अजीब सी फितरत लिए जिए जाते हुए अब आकर निरर्थकता का अनुभव हो रहा है ---की न खुदा ही मिला न विसाले सनम ---लेकिन सबकी कमोबेश यही हालत है ---किसको क्या मिलता है शायद ये बात सच है शायर दानिश की कि तबियत ही कुछ ऐसी पी है उसने /न हो कोई उलझन तो उलझा रहेगा ये आज के इन्सान का सच है .मगर अनकही अकारण उदासी जब जिंदगी को फरेब देने लगे तो जीने का अंदाज़ बदल देना चाहिए -----
सुनिए सबकी कहिये न कछु रहिये इमि या मन बगर मैं
करिए व्रत नेम सचाई लिए जिन सों तरिये भवसागर मैं
मिलिए सबसों दुर्भाव बिना रहिये सत्संग उजागर मे
रसखान गोविन्दहि यों भजिये जिमि नागरि कौ चित गगरि मैं
बिना प्रभु की शरण मे जाए उदासी दूर नही हो सकती क्योंकि --दिल को कैसे करार आता है ये लिखा ही नहीं किताबों मैं (दानिश)
शनिवार, 12 जुलाई 2008
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6 टिप्पणियां:
Rajraniji, bhut badhiya.
हिन्दी चिट्ठाजगत में आपका स्वागत है. नियमित लेखन के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाऐं.
वर्ड वेरिपिकेशन हटा लें तो टिप्पणी करने में सुविधा होगी. बस एक निवेदन है.
हिन्दी ब्लाग का स्वागत है ।
शुरूआती दिनों में वर्ड वेरीफिकेशन हटा लें इससे टिप्पयणियों की संख्या प्रभावित होती है
(लागईन - डेशबोर्ड - लेआउट - सेटिंग - कमेंट - Show word verification for comments? No)
आरंभ ‘अंतरजाल में छत्तीसगढ का स्पंदन’
बहुत बढिया ! वो किताबों मे कहां मिलेगा ?
वो तो मन रुपी ब्रज मे ही मिलेगा !
शुभकामनाएँ !
aapki lekhni par prabhu kripa bani rahe.......
bahut hi achchha likha hai maa| aapne to bahut hi jaldi computer use karna seekh liya, na sirf computer balki internet bhi.Badhaaiyaan.
Cheers!!
-Anindya
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