शनिवार, 13 दिसंबर 2008
एक सपना मीठा सा
माना की वो दिन अब नहीं हैं जब युवा पीदी केवल रंग और रस मैं सराबोर रहती थी ---आज का युवा तो जी तोड़ मेहनत करता है उसके काम के घंटे बेहिसाब हैं उसकी लगन लाज़बाव है ;उसकी एक प्यारी सी दुनिया है जो उसने अपनी मेहनत से ख़ुद रची है ---और उसकी मेहनत से खुश हो कर प्रभु भी उस पर प्रतिपल कृपा बरसाते रहते हैं जिक्र उसी दुनिया के एक छोटे जादूगर का है जिसने एक सपना देखा मीठा सा और अपनी पूरी शक्ति और पूरी भक्ति से उसे पूरा करने मैं लग गया अपनी मां का ये नन्हा सा कन्हैया सात समंदर पार गया प्रभु ने उसे कृपा के पंख दिए ---समझ दी और हौसला भी दिया और एक दिन सपने की कहानी मैं रानी भी आगई --एक सुकुमार सी प्यारी सी रानी जो कृपा का कहो या संयोग का एक अनोखे प्रसाद की तरह उस जादूगर की छड़ी बन कर आई ---और सब पर अपनी मोहिनी डाल दी -----ये एक मशहूर कहानी का जाना पहचाना सन्सकरन है जिसमे मीठे से सपनो की महक है ---अथक परिश्रम की चमक है --और सच्चाई की गमक है सपने को अपना बनाने की ललक है इसीलिए तो अनमोल सी अनोखी सी कशिश को लेकर जो ये कारवां सॉफ्टवेर इंजीनेर्स का गया है इनके सपनों की खूबसूरती से एक नया इतिहास रचा जा रहा है -----ये प्यारे से नौजवान जो घर से दूर घर बसाने का सपना देखते हैं वही इनकी मेहनत की मीठी सी दास्ताँ है । सपनों की महक से लवरेज इनके मन बहुत ही सुंदर हैं क्योंकि उनमें बदलते हुए समय की खनक सुनाई देती है देखते ही देखते दुनिया को बदलने की सोच भी और तजवीज़ भी ---यही वो पीढी है जिस मैं सच्चाई है निष्ठां है और दूरदर्शिता है ---मन से दुआ देते हैं की इनका आसमान सतरंगे इन्द्रधनुशो से भरा रहे इनकी गोद मैं खुशियों के हजारों फूल महकते रहें इनका ज़हान प्रभु की कृपा से सदा आबाद रहे कुछ शब्द इनके जीवन मैं कभी न आंएँ जैसे उदासी .....निराशा और नोस्टेल्जिया भी न हो ---ये प्यारी सी नई पीढी अपने अपने मीठे सपनों को पूरा करने मैं जी जान लगा दें -----तस्वीरmain सुंदर रंग भरें जीवन मैं फूलों की राहें --- मिलें -----देश की एक मां का आशीष सबकोपहुंचे १४ दिसम्बर २००८ के विशेष अवसर की सबको बधाई एक सच होने वाले मीठे सपने की सालगिरह कीहज़ार हज़ार बधाई - की सबको प्रभु तुम्हे और बहुत सारे सपने देखने का हौसला दें और पुरा करने की शक्ति देंमगर शर्त ये है की हर सपना पहले सपने को और अधिक खुश करने के लिए हो ------जय श्री कृष्ण !
शनिवार, 29 नवंबर 2008
कब तक
अंधाधुंध गोलियों की बौछार से आज तो मै और मेरा परिवार बच गया लेकिन कल का क्या भरोसा ---आख़िर बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी कब तक हम एक आशंका भरी ज़िन्दगी मैं पल पल मर मर कर जीते रहेंगे --सभी को महानगरों मैं रहना है ---काम पर भी जाना है ---और खास दर्द को धोते हुए जाना है की आज लोटे या नही ?---देश के जावन शहीद हो रहे थे आतंक से लड़ कर और दूसरी तरफ़ देश के कलम्गर पत्रकार और फोटो ग्राफर अपनी अपनी कामयाबी के झंडे गद रहे थे बड़ा ही दयनीय लग रहा था एक पत्रकार ने तो उसे असली रियलिटी शो का नाम भी दे दिया और अपनी पेशकश पर बड़ा खुश भी हुआ होगा ---लेकिन मेरा मन तो वित्रश्ना से भर गया ---साहित्य मैं एक रस है करूँ रस जिसने केथार्सिस का सिधांत लागु होता है यानि जब हम करून रस को भी आस्वाद ले कर देखते हैं ठीक इसी तरह लग रहा था जब हम असहनीय दृश्यों को भी चर्चा कर कर के देख देख रहे थे --और ख़ुद को महिमामंडित कर बड़े ही संवेदनशील समझ रहे थे की भाई हमने तो एक मिनिटे के लिए भी टी.वि । बंद नही किया ---लेकिन सोचो कबीर ने कहा है ------जगत चबेना कल का कुछ मुख मैं कुछ गोद ---इस पंक्ति का अर्थ अब हो गया है ----भारत चबेना आंतंक का कुछ मुख मैं कुछ गोद ---और भी कहा आज नही तो कल तुम सबकी बार आही जायेगी आख़िर बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी ------ फूली फूली चुन लई कलः हमारी बार ---इस पंक्ति की भी ध्वनी बदलआखि r वारूद के ढेर पर बैठ कर कोई कब तक बच पायेगा -----मेरा एतराज़ सिर्फ़ ये है की हम अपने शहीदों की मौत को शहादत को भी सुचना मात्र मैं न बदल देन ये एक जघन्य अपराध होगा -----आख़िर ये न्यूज़ चैनल कहाँ तक जायेंगे कल को तो ये युध का भी लाइव कवरेज़ करेंगे ---आखि इनकी उर्जा खुफिया तंत्र मैं क्यों नही लगती क्यों ये दोसरों की तवाही का जश्न का मन कर अपने झंडे गड़ना चाहते हैं इन्हे अपने कम पर गर्व नही घराना होनी चाहिए क्या पहले जब शहादत को टेलेकास्ट नही किया गया तब वीरों का आदर देस्गह ने नही किया ---और मैं तो यहाँ तक मानती हूँ की ये लोग ही आतंकियों को उकसाने का भी अपराध करते हैं और ऐसा जघन्य अपराध जिसकी सज़ा भी कोई इन्हें नही देता शायद इनके न्यूज़ परोसने ढंग को देख कर दुश्मन नै से नै आतंकी योजनायें बनते है और इन्हें फ़िर एक कवरेज़ का मौका मिल जाता है कोई तो इस ब्लॉग को पढ़े और शहादत का लाइव टेलेकास्ट रोके ----अमल्य और महान शहादत इनके ओछे लफ्जों से मैली न हो मेरे देश के वीरों की आत्मा को मेरा प्रणाम ---वो हमें अपनी नुमायश के लिए क्षम्मा करें ----भारत और भारत बासियों को सदबुधि मिले मेरे देश को अपरिपक्वा पत्रकारों के बचकाने अपराधों कोई बचाए और हम आतक की लडाई समझदारी और सूझ बुझ से लड़ें ---जय हिंद
शुक्रवार, 5 सितंबर 2008
दर्द
प्रभु की कृपा का अनुभव करने के लिए भी प्रभु की कृपा का ही आसरा लेना ज़रूरी है --ये बड़ी विडम्बना है प्रभु जो कोई दर्द जानते ही नही हैं या जान कर भी जानना नही चाहते क्योंकिधर्मवीर भारती ने लिखा भी है -
तुम क्याजानोगे ओ !प्रभु उन गत्यवरोधों का दर्द
तुमने कब झेली संक्रांति /कैसे तरुनाई मैं ही घुट मर जाते हैं विश्वास /प्राणों की समिधायें जम कर हो जाती हैं सर्द
सो ऐसे प्रभु से उम्मीद न रखो जो आंसुओं का कुछ ज्यादा ही सस्ता भावः लगाते हों औरजिन्हें मनाने को पूरा जीवन भी कम पड़ता हो फ़िर भी जैसे उडि जहाज को पंछी फ़िर जहाज पर आवे उसी तरह की दशा है कि 'जाऊं कहाँ तजि चरण तिहारे 'सो प्रतीक्षा ही प्रतीक्षा है आगे उसकी इच्छा है सो कबहुँकमातअवसर सुधि भी हमारी सुधि भी कथाहमारीकहीं कोई hamari भी सुधि दिला सके क्योंकि prabhu को to विश्वास ही नही आता होगा की कोई tirepan sal bitakar भी ऐसा rita होगा की ख़ुद से नफरत हो जाए zindagi इस मोड़ पर aajaye की न जिया जाए न mra जाए सो इस नरक सेबचने का कोई sadhan to dhundhna ही पड़ेगा aaspas to ऐसी duniya है की मन vyakul रहता है ----prabhu sharan का ही aasara है क्योंकि zindagi ने zab chuaa tab fasla रख कर chhuaa------zindagi का गीत कुछ इस तरह कठिन था की किसी को समझ नही आया सो एक ankahi dastaan को leker ही jahan से kuunch करना होगा इसलिए prabhu को manana बहुत ही ज़रूरी हो गया है ------तुम janat सब antaryami karni kachu न करी अब मेरी rakho laz hari ----
तुम क्याजानोगे ओ !प्रभु उन गत्यवरोधों का दर्द
तुमने कब झेली संक्रांति /कैसे तरुनाई मैं ही घुट मर जाते हैं विश्वास /प्राणों की समिधायें जम कर हो जाती हैं सर्द
सो ऐसे प्रभु से उम्मीद न रखो जो आंसुओं का कुछ ज्यादा ही सस्ता भावः लगाते हों औरजिन्हें मनाने को पूरा जीवन भी कम पड़ता हो फ़िर भी जैसे उडि जहाज को पंछी फ़िर जहाज पर आवे उसी तरह की दशा है कि 'जाऊं कहाँ तजि चरण तिहारे 'सो प्रतीक्षा ही प्रतीक्षा है आगे उसकी इच्छा है सो कबहुँकमातअवसर सुधि भी हमारी सुधि भी कथाहमारीकहीं कोई hamari भी सुधि दिला सके क्योंकि prabhu को to विश्वास ही नही आता होगा की कोई tirepan sal bitakar भी ऐसा rita होगा की ख़ुद से नफरत हो जाए zindagi इस मोड़ पर aajaye की न जिया जाए न mra जाए सो इस नरक सेबचने का कोई sadhan to dhundhna ही पड़ेगा aaspas to ऐसी duniya है की मन vyakul रहता है ----prabhu sharan का ही aasara है क्योंकि zindagi ने zab chuaa tab fasla रख कर chhuaa------zindagi का गीत कुछ इस तरह कठिन था की किसी को समझ नही आया सो एक ankahi dastaan को leker ही jahan से kuunch करना होगा इसलिए prabhu को manana बहुत ही ज़रूरी हो गया है ------तुम janat सब antaryami karni kachu न करी अब मेरी rakho laz hari ----
बुधवार, 3 सितंबर 2008
गुरु कृपा
ज़िन्दगी की शुरुआत ही गुरु से होती है प्रथम गुरु मां होती है फ़िर ये जो ishawar कहिये या गुरु कहिये मां ही और सब गुरुजनों से मिलवाती हैं कदम कदम पर गुरु हमारी रह dikhane को खड़े मिल्जाते हैं ये बस कृपा का ही jadu ज़िन्दगी भर चलता रहता है .'मानस की काली मावस को गुरु गुरुपूनों से धोते रहते हैं और अपनीकरुना से हर लोहे को परस बनाते रहते हैं भारत जैसे गौरवशाली देश मैं जहाँ गुरु शिष्य परम्परा को पवित्र माना जाता है दुःख होता ये देख कर कि आज की बदलतीदुनिया मैं गुरु शब्द का भी अर्थ बदल गया है ---गुरु शब्द मैं से गरिमा को निकाल देने मैं कुछ तो वक्त की मज़बूरी है और कुछ शासन की
अरे चौंक गए भइयाहमारे प्रदेश मैं तो शिक्षा कर्मी होते हैं न गुरु न गरिमा किसी का कोई झनझट ही नही कैसा विचित्र संबोधन है और कैसी विडम्बना है किपूरा समाज उसे बिना किसी एतराज़ के स्वीकार करता है अरे vidya से जब हम शिक्षा पर आगये तब भी भी किसी के कान पर जूं नही रेंगी अगर शिक्षा ही होती तो हमारी विद्या का क्याऔर ये क्यों कहते कि गुरु गृह गए पढ़न रघुराई अल्प काल विद्या सब पाई ---खैर ये तो कुछ ज़्यादा ही हो गई -----अब तोसब वक्त की बलिहारी है कहीं शिक्षाकर्मी हैं तो कहीं गुरूजी हैं हैं सब निरीह !कहाँ का मान कहाँ की शान अब तो जैसे और धंधे वैसा ही ये शिक्षाकर्मी का धंधा है रही बात गुरु की तो गुरु शब्द के तो अनेक अर्थ हो गए ---"बड़ा गुरु है !---अरे गुरु हमसे क्याछुपा है अरे गुरु !!!!!बगैरह वगैरह ----शायद मुझसे ज़्यादा प्रसग तो आपको याद आगये होंगे इस सबके वावजूद विडंवना यह की हमें इस विकलांग श्रध्दा के दौर मैं भी अपने बच्चों को unhi तथाकथित गुरु या शिक्षाकर्मी की शरण मैं भेजना पड़ता है ---और फ़िर हमारी पीढी अगर खोई खोई सी रहे तो अचरज कैसा !आख़िर मानदंड तो हमने ही तय किए हैं न अपनी संवेदना कोबहरा बनानेवाले भी तो हमीं हैं न फ़िर कविता याद आती है सचमुच बहुत देर तक सोये इदह्र यहाँ से उधर वहां तक धुप चढ़ गई कहाँ कहाँ तक /लोगों ने इतिहास रच दिए हमने सब संबोधन खोये /सचमुच बहुत देर तक सोये -----
अरे चौंक गए भइयाहमारे प्रदेश मैं तो शिक्षा कर्मी होते हैं न गुरु न गरिमा किसी का कोई झनझट ही नही कैसा विचित्र संबोधन है और कैसी विडम्बना है किपूरा समाज उसे बिना किसी एतराज़ के स्वीकार करता है अरे vidya से जब हम शिक्षा पर आगये तब भी भी किसी के कान पर जूं नही रेंगी अगर शिक्षा ही होती तो हमारी विद्या का क्याऔर ये क्यों कहते कि गुरु गृह गए पढ़न रघुराई अल्प काल विद्या सब पाई ---खैर ये तो कुछ ज़्यादा ही हो गई -----अब तोसब वक्त की बलिहारी है कहीं शिक्षाकर्मी हैं तो कहीं गुरूजी हैं हैं सब निरीह !कहाँ का मान कहाँ की शान अब तो जैसे और धंधे वैसा ही ये शिक्षाकर्मी का धंधा है रही बात गुरु की तो गुरु शब्द के तो अनेक अर्थ हो गए ---"बड़ा गुरु है !---अरे गुरु हमसे क्याछुपा है अरे गुरु !!!!!बगैरह वगैरह ----शायद मुझसे ज़्यादा प्रसग तो आपको याद आगये होंगे इस सबके वावजूद विडंवना यह की हमें इस विकलांग श्रध्दा के दौर मैं भी अपने बच्चों को unhi तथाकथित गुरु या शिक्षाकर्मी की शरण मैं भेजना पड़ता है ---और फ़िर हमारी पीढी अगर खोई खोई सी रहे तो अचरज कैसा !आख़िर मानदंड तो हमने ही तय किए हैं न अपनी संवेदना कोबहरा बनानेवाले भी तो हमीं हैं न फ़िर कविता याद आती है सचमुच बहुत देर तक सोये इदह्र यहाँ से उधर वहां तक धुप चढ़ गई कहाँ कहाँ तक /लोगों ने इतिहास रच दिए हमने सब संबोधन खोये /सचमुच बहुत देर तक सोये -----
शुक्रवार, 29 अगस्त 2008
तुम जियो हजारों साल !
प्रभु की कृपा तुम पर हर वक्त बरसती रहे ,तुम्हारी ज़िन्दगी मैं फूल ही फूल बिछे हों .कोई दुःख तुम्हारे पास से हो कर भी न निकले ---मेरे बच्चे सात समंदर पर बैठी येतेरी मान क्या दुआ करे की तेरी ज़िन्दगी zadu की तरह चले ---एक bhagwan का ही bharosa है की सात समंदर पर बैठे मेरे बच्चे का saya बने रहेंगे .मान to बस अपने kaleze को terei aashish से भरा एक tukda manti है ---siway shubhakamna के और क्या दे सकती है ---वो हज़ार हज़ार यादें जो बचपन से लेकर आज तक वो हज़ार हज़ार sapne जो तेरे लिए देखे हैं उन प्रभु की कृपा का भरोसा-- है न बस ज़रा सी बातकी अब मुझसे भजन नही बनता है फ़िर प्रभु की कृपा -का -भी भरोसा है सुन आज - ---- -----aur sun aaj तेरी बर्थडे पर कोई काम i नही था मुझे करने को तू कब बड़ा हो गया कब दूर चला गया ये अहसास अबजाकर हुआ जब pas रहता था तो ये मां तुझे कुछ न कुछ पढने के लिए kahti या डांडती ही रहती थी --याद आता है वो प्रसंग जब नंदबाबा कृष्ण के मथुरा चले जाने पर यशोदा से कहते हैं ----जब तूमारिबू ही करत ---अर्थात जब कृष्ण गोकुल मैं रहता था तब तू मारती ही रहती थी और यशोदा बिलख कर कहती है -----"फ़िर ब्रिज बसहु गोकुलनाथ ---बहुरिन तुम्हे जगाय पथ्वहुन गोधनं के साथ
बरजों न माखन खात कबहूँ देहूं देन लुटाय -----न मैं तुम्हे माखन खाने से रोकूंगी न लुटाने से लेकिन कन्हैया एक बार तो गोकुल आजा ----यही आर्त पुकार हर मां की है जिस जिस का बेटा बड़ा हो कर ज़िन्दगी की कर्मभूमि मैं चला गया है हर वक्त वो मां अपने बच्चों के sath ही होती है फ़िर ये समन्दरों की दूरियां क्या लगती हैं ?---के मेरे लाल जहाँ भी रहे खुश रह तू हमेशा तेरी हर bala कोअपने सर ले कर अपने लाल के हज़ार हज़ार सदकेउतारती है कन्हैया !हर ज़गह तुझे शुभकामनाओं का माखन मिलता रहेगा हर समय मां की दुआओं का साया तेरे सर पर रहेगा औरईश्वर कृपा का मयूर पंखसदा तुझे राह बताता रहेगा----
बरजों न माखन खात कबहूँ देहूं देन लुटाय -----न मैं तुम्हे माखन खाने से रोकूंगी न लुटाने से लेकिन कन्हैया एक बार तो गोकुल आजा ----यही आर्त पुकार हर मां की है जिस जिस का बेटा बड़ा हो कर ज़िन्दगी की कर्मभूमि मैं चला गया है हर वक्त वो मां अपने बच्चों के sath ही होती है फ़िर ये समन्दरों की दूरियां क्या लगती हैं ?---के मेरे लाल जहाँ भी रहे खुश रह तू हमेशा तेरी हर bala कोअपने सर ले कर अपने लाल के हज़ार हज़ार सदकेउतारती है कन्हैया !हर ज़गह तुझे शुभकामनाओं का माखन मिलता रहेगा हर समय मां की दुआओं का साया तेरे सर पर रहेगा औरईश्वर कृपा का मयूर पंखसदा तुझे राह बताता रहेगा----
शनिवार, 26 जुलाई 2008
आज़ादी की रस्म ओ रिवाज़ j
जश्ने आज़ादी मनाने का वक्त आपहुंचा है ;चलो एक बार फ़िर रस्म अदायगीकरें ------वो आज़ादी जिसे पाने की जद्दो ज़हद से हम बेखबर है --बस सुना सुना है कि बड़ी कीमत दे कर आई है आज़ादी --और आज आजाद भारतके निवासी हम सब एक निश्चित दिन जश्न मानते हैं .मुझे तो लगता है हम भारत के लोग जो रोज़ आकंठ जश्न मैं डूबे ही रहते हैं
आज तो हालात ये है कि ------आग लगे हमरी झुपडिया मैं ,हम गायें मल्हार --यानी मनोरंजन कि बढ़ आई है चारों तरफ़ खुशफहमियां हैं गीत नाच है मन को बहलाने के हज़ार साधन हैं और हमारा भोला भाला युवा अपने चंद
बहलाबों मैं भूला सा भरमा सा कभी अपने ब्रांडेड लिबास पर इठलाता है तो कभी अपने बेशकीमती गजेट्स पर फख्र ज़ाहिर करता है .कभी अपने पे पैकेज पर नाज़ करता है कभी अपनी पसंदीदा डिशेस का पक्का मुरीद बन कर ज़ाहिर करता है कि मैं भी आजाद हूँ ;मेरी अपनी ख़ुद अपने हाथों से बनाई जिंदगी जो कि इतनी ख़ूबसूरत है ---अरे ये जिंदगी तो अपने आप मैं एक जश्न है क्यों कि आज़ादी है हमें चाहें तो पिज्जा खाएं चाहें ----बर्गर चाहें जिस महगे से महगे रेस्तरां मैं जायें चाहें जब हजारों रुपया उडाएं --यही तो असली जिंदगी है ---अब इसमें कहाँ है आज़ादी का जश्न और कहाँ है देश का स्वप्न -----अरे हम तो ऐसे फिरंगियों कि नौकरी कर रहे हैं जो हमारे त्यूहार जाने न हमारा गौरव माने जिस यांत्रिकता से ऊब चुके हैं पछिम वाले उसी यांत्रिकता मैं हमें ढकेलने की तईआरी है .फ़िर आप ही बताओ कैसा जश्न और कैसी आज़ादी ?अब तो पाउचों के ढेर मैं दबी हमारी नन्ही नन्ही खुशियाँ हमारे सामने दम न तोड़ रही होती और बिना ये हिसाब लगाये की इस ब्रांडेड जिंदगी के छलाबे मैं हमने क्याक्या खोया हैहम इस कदर न बदल जाते --जहाँ हमारे देश मैं जिंदगी निकल जाती थी कोई किसी कीअसली हैसियत नही नाप पाता था वहीं आज नौकरी लगी और कल से बेटे का पे पकेज रिश्तेदारी बुलेटिन की चर्चाओं मैं होता है .कैसे बदल गए हमारे जीवन मूल्य ?? कहाँ गई हमारी विरासत की वो कहावत की 'बंधी मुट्ठी लाख की ,खुल गई तो खाक की ' ----अरे मैं भी कहाँ की चर्चा ले बैठी ?आज तो ज़माना बदल गया है न !जश्ने आज़ादी तो है -----मगरजश्न ऐ आज़ादी नही है ---शायर दानिश ने क्या मोजुं शेर कहा है -'खुश नज़र आते हैं गुल ,गुलदान मैं /किस कदर गाफिल हैं झूठी शान मैं '----चलिए आज आजादी के बहने आज़ादी की बात निकली तो कुछ दर्द का परचम हमने भी लहरा दिया सही है अपने अपने परचम हैं .ये भी क्या कम है .
आज तो हालात ये है कि ------आग लगे हमरी झुपडिया मैं ,हम गायें मल्हार --यानी मनोरंजन कि बढ़ आई है चारों तरफ़ खुशफहमियां हैं गीत नाच है मन को बहलाने के हज़ार साधन हैं और हमारा भोला भाला युवा अपने चंद
बहलाबों मैं भूला सा भरमा सा कभी अपने ब्रांडेड लिबास पर इठलाता है तो कभी अपने बेशकीमती गजेट्स पर फख्र ज़ाहिर करता है .कभी अपने पे पैकेज पर नाज़ करता है कभी अपनी पसंदीदा डिशेस का पक्का मुरीद बन कर ज़ाहिर करता है कि मैं भी आजाद हूँ ;मेरी अपनी ख़ुद अपने हाथों से बनाई जिंदगी जो कि इतनी ख़ूबसूरत है ---अरे ये जिंदगी तो अपने आप मैं एक जश्न है क्यों कि आज़ादी है हमें चाहें तो पिज्जा खाएं चाहें ----बर्गर चाहें जिस महगे से महगे रेस्तरां मैं जायें चाहें जब हजारों रुपया उडाएं --यही तो असली जिंदगी है ---अब इसमें कहाँ है आज़ादी का जश्न और कहाँ है देश का स्वप्न -----अरे हम तो ऐसे फिरंगियों कि नौकरी कर रहे हैं जो हमारे त्यूहार जाने न हमारा गौरव माने जिस यांत्रिकता से ऊब चुके हैं पछिम वाले उसी यांत्रिकता मैं हमें ढकेलने की तईआरी है .फ़िर आप ही बताओ कैसा जश्न और कैसी आज़ादी ?अब तो पाउचों के ढेर मैं दबी हमारी नन्ही नन्ही खुशियाँ हमारे सामने दम न तोड़ रही होती और बिना ये हिसाब लगाये की इस ब्रांडेड जिंदगी के छलाबे मैं हमने क्याक्या खोया हैहम इस कदर न बदल जाते --जहाँ हमारे देश मैं जिंदगी निकल जाती थी कोई किसी कीअसली हैसियत नही नाप पाता था वहीं आज नौकरी लगी और कल से बेटे का पे पकेज रिश्तेदारी बुलेटिन की चर्चाओं मैं होता है .कैसे बदल गए हमारे जीवन मूल्य ?? कहाँ गई हमारी विरासत की वो कहावत की 'बंधी मुट्ठी लाख की ,खुल गई तो खाक की ' ----अरे मैं भी कहाँ की चर्चा ले बैठी ?आज तो ज़माना बदल गया है न !जश्ने आज़ादी तो है -----मगरजश्न ऐ आज़ादी नही है ---शायर दानिश ने क्या मोजुं शेर कहा है -'खुश नज़र आते हैं गुल ,गुलदान मैं /किस कदर गाफिल हैं झूठी शान मैं '----चलिए आज आजादी के बहने आज़ादी की बात निकली तो कुछ दर्द का परचम हमने भी लहरा दिया सही है अपने अपने परचम हैं .ये भी क्या कम है .
बुधवार, 23 जुलाई 2008
यादों का सावन
सुना है की सावन मैं झडी लग जाती है तो उसके साथ यादों की भी बरसात होती है --मुझे याद आरहा है वो सावन जब नानी से कह कह कर झूला डलवाते थे ,और खाना पीना पढ़ना सब उसी झूले पर होता था .नानी याद कर कर के गीत सुनाती थी झूलती मै थी और गाने नानी गाती थी कहती कि बिना गीत का झूला अशुभ होता है और शगुन की तो मानो थोक दुकान थी नानी !बिना अतिरिक्त पैसे खर्च किए वो सावन मनता था कि आज भी भिगोता रहता है कहीं भी कभी भी जब नानी की याद आ जाए .मानो मन की धरती आर्द्र हो उठती है ----कहाँ गई जीवन की वो अद्भुत कलाएं जब उम् हर वक्त भीगने -भिगोने को तयार रह्ते थे उमंग उल्लास को दूर दूर से लाक्ते थे आज भी वही सावन है वही पुरवा -पछुआ हैइ लेकीन सावन की बौछारों मैं भीगने का मन है न झूला झूलने का ----कहाँ खोया सावन का अंदाज़ आज तो अंतहीन इंतजार है ---कोई हमें भी बुलाये ;कोई हमें भी झुलाये कोई तो कहे की बेटी आ सारी व्यस्तताओं को भूल कर आ ----मगर कहाँ गई इसरा र की भाषा कहाँ गई शगुन मानती नानियाँ - शायद सब आज की उपलब्धियों मै शहीद होगयीं न रहा सावन न झूले ---बचा है तो बस ये की अरे चलो फोन कर लिया छुटी हुई और मन को समझा लिया की हमने तो खूब कहा लियाा आज कल के बच्चों को फुर्सतकहाँ----और मन से भी छिपा लिया गज़ब मजबूरियां है------हर बार सोचती हूँ इस बार सावन मैं पहले वाले अंदाज़ मै ही जाउंगी ---मगर नही जा पाती शंकर जी की चेतावनी याद आजाती है ---जो बिन बोले जाहू भवानी -----अरे नही मै तो यूँही कह रही मुझे तो माँ लगभग हर रोज़ बुलातीं हैं और हजारों बार कहती हैं कि आया कर बेटा ! मगर ये मेरा ही मन मैला हो गया है जो अनकही बातों को सुनता रहता है ---आएगी तो बड़ी बहागाम्भाग सी मच जायेगी ---मार कम फ़ैल जाएगा और फ़िर खर्चा होगा सो अलग अभी तो छोटी वाली आई थी हर रोज़ कोई न कोई खर्च खाए जाता अही अब कौन आता सावण मै बूढी बेटियों को कोंन बुलाता है -------नही ये सब तो मै कह रही हूँ मां की मम्मता तो खरे सोने की तरह आज भी दमकती है तभी तो हर जन्मदिन पर फोन आता है -----सावन लता है माँ का हर फोन बौछारें भी लता है माका हर फोन मगर झूला झुलाती हैं नानी आज भी नानी हर सावन मैं झूला डालती है मै रोज़ अपनी जिंदगी की हजारों व्यस्तता से समय चुरा कर झूले पर बैठी होती हूँ ---ये और बात है कि लोगों को लगता है मै काम कर रही हूँ ;मै खाना बना रही हूँ ;मैं ड्राइविंग कर रही हूँ --मगर पूरे सावन मैं तो झूले पर बैठी होती हूँ और मेरी नानी शगुन के गीत गाती रहती है तभी सावन जिंदा है उस सावन की बदौलत मैं जिंदा हूँ और जिंदा है मन के आँगन का अंतहीन गीलापन -------
शनिवार, 12 जुलाई 2008
मन आँगन
निर्व्याख्या उदासी के पहरे मैं पहरों बिताने वाला ये तुम्हारा गुनगुना सा मन कुछ ज़्यादा ही नक्शे देता है कोई पूछे न पूछे;सबको खामख्वाह अपने ग़मों का पता देता है ;---तुम पर हर अहसास तुम्हारा भारी है ---जी से दानिश कैसा रोग लगाया है ---और इस तरह एक अजीब सी फितरत लिए जिए जाते हुए अब आकर निरर्थकता का अनुभव हो रहा है ---की न खुदा ही मिला न विसाले सनम ---लेकिन सबकी कमोबेश यही हालत है ---किसको क्या मिलता है शायद ये बात सच है शायर दानिश की कि तबियत ही कुछ ऐसी पी है उसने /न हो कोई उलझन तो उलझा रहेगा ये आज के इन्सान का सच है .मगर अनकही अकारण उदासी जब जिंदगी को फरेब देने लगे तो जीने का अंदाज़ बदल देना चाहिए -----
सुनिए सबकी कहिये न कछु रहिये इमि या मन बगर मैं
करिए व्रत नेम सचाई लिए जिन सों तरिये भवसागर मैं
मिलिए सबसों दुर्भाव बिना रहिये सत्संग उजागर मे
रसखान गोविन्दहि यों भजिये जिमि नागरि कौ चित गगरि मैं
बिना प्रभु की शरण मे जाए उदासी दूर नही हो सकती क्योंकि --दिल को कैसे करार आता है ये लिखा ही नहीं किताबों मैं (दानिश)
सुनिए सबकी कहिये न कछु रहिये इमि या मन बगर मैं
करिए व्रत नेम सचाई लिए जिन सों तरिये भवसागर मैं
मिलिए सबसों दुर्भाव बिना रहिये सत्संग उजागर मे
रसखान गोविन्दहि यों भजिये जिमि नागरि कौ चित गगरि मैं
बिना प्रभु की शरण मे जाए उदासी दूर नही हो सकती क्योंकि --दिल को कैसे करार आता है ये लिखा ही नहीं किताबों मैं (दानिश)
शुक्रवार, 11 जुलाई 2008
मौत की मुनादी
जीवन की सांझ आने से पहले कुछ आवाजें मन को झकझोर कर रख देती हैं .चरों और से एक अंतर्नाद सुनाई देता है ;ज़ल्दी करो ज़ल्दी करो आज के तात्कालिक कम निपटाओ और ये ज़ल्दी कभी ख़त्म नही होती ---तुलसी ने लिखा है न"डासत ही गई बीत निशा न कबहू मैं नाथ नींद भरि सोयो "---सचमुच बिछाते बिछाते रात बीत गई और न नींद आइ न चैन मिला .सभी का यही हाल है जीने की तयारी मैं जीवन निकल गया .एक दिन अचानक कुछ शोर सा सुने दिया ----क्या हो सकता है मन मैं इतना भय क्यों है ये आवाजें कैसी हैं ?अरे !ये तो अपनी ही मौत की मुनादी हो रही है ----तुमने ये ये किया इसलिए जिंदगी देने वाला तुमसे खफा हो गया और ये लो आज तम्हारी मौत की मुनादी सुनाई जा रही है ---सावधान !(डर गई क्या /अरे !डरना क्यों ?ये तो बड़ी बेकार सी मुनादी है रे !एक ही बार मे किस्सा खत्म हो जाएगा -----मगर जिं दगी भर तो बिना आहट के मरते रहे उसका क्या चलो अच्छा हुआ टुकड़े टुकड़े मरने से तो पीछा छोटेगा कबीर ने लिखा है न 'मरने से सब जग डरे मेरे मन आनंद कब मरिहों कब भेटिहों पूरण परमानन्द .
सोमवार, 30 जून 2008
शब्दों का सफर: बतंगड़ की बतकही [बकलमखुद-40]
शब्दों का सफ
र: बतंगड़ की बतकही [बकलमखुद-40]
achhalaga maulikta aur rochakta doonon hain
rajranisharma
र: बतंगड़ की बतकही [बकलमखुद-40]
achhalaga maulikta aur rochakta doonon hain
rajranisharma
मंगलवार, 22 अप्रैल 2008
chhanv
chattan ki chaanv main guzarti zindagi bhi khoobsoorat ho sakti hai basharte ki tmhara zine ka aandaaz zara hat kar ho .zaroori nahi ki chaav bhi tumhari pasand ki ho chaanv hai yahi kya kam hai ;zo mila wo aukat se zyada hai aur aisi chhanv ka kuch alag hi maza hai ---------sukh wahi achha zo dukh ki chashani main lipta hirahe sukh nahi sukh ka fusion yaani aabhas bana rahe
मंगलवार, 15 अप्रैल 2008
yashoda ka krish prem

कृष्ण को मैं कभी यशोदा की आंखों से देख पाउंगी क्या ?यशोदा जैसा दुग्ध धवल मॅन पा सकूंगी क्या ?बड़ा ही मन होता है यशोदा के कृष्ण प्रेम से भरे मॅन मैं झाकने का.मुझे लगता है की यशोदा पूरे समय अपना मॅन ही मथती रही जब होगी .दही मथने का तो मानों बहाना था म्मन्न को मैथ मैथ कर ऐक एक भाब को कृष्ण मय बनाने का संकल्प लिएजब यशोदा दही मथती होगी वह माखन कृष्ण को भाता होगा इसी लिए कृष्ण माखन चोर बन गया होगा सोचता होगा सबके माखन मैं ऐसा ही रस होगा .और ये भी तो सच है की कृष्ण की माँ यशोदा ऐसी मुग्ध मनः दशा इसलिए रहती हो अंतर्मन मैं उसे पता हो की कृष्ण को तो एक दिन जाना ही है .मन ही मन इस आंच से उद्वेलित हो कर जो यशोदा का कृष्ण वात्सल्य उमदा है उसे अगर एक घड़ी या आधी घड़ी भी जी सकूं तो समझूंगी की जीवन एक पल जिया .यशोदा के मॅन के कृष्ण विरह को जी सकने के लिए तो बड़ी तपस्या की ज़रूरत है प्राण निकलते हैं इस पंक्ति पर जब यशोदा कहती है ''है कोई ब्रिज मैं हितु हमारौ चालत गोपलाही रखीवाह री कृष्ण मात यशोदा धन्य हो तुम
- कृष्ण मात यशोदा '
kripamai
कल आज और कल; से मिल बना कर जीवन को जीते टू हैं लेकिन सुनियोजित तरीके से न जी पाने का अफ़सोस होता है
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